*व्रत और उपवास हमें देते हैं अलौकिक शक्ति -- रामबालकदास महात्यागी*
व्रत और उपवास हमें देते हैं अलौकिक शक्ति -- रामबालकदास महात्यागी
मनुष्य को उन्नत जीवन की योग्यता व्रत से मिलती है
आचरण की शुद्धता को कठिन परिस्थितियों में भी न छोड़ना उसका निष्ठापूर्वक पालन करना ही व्रत कहलाता है। शरीर, मन एवं आत्मा की शुद्धि करते हुये अलौकिक शक्ति प्राप्त करने का माध्यम है उपवास।
पाटेश्वरधाम के आनलाईन सतसंग में रामबालकदास जी महात्यागी ने जीवन में व्रत और उपवास की महत्ता प्रतिपादित करते हुये कहा कि वस्तुत: विशेष संकल्प के साथ लक्ष्य सिद्धि के लिये किये जाने वाले कार्य का नाम व्रत है। असंयमित जीवन जीने के कारण जो अशुद्धियाॅ आ जाती हैं उनके निवारण का सफल उपाय व्रताचरण ही है। अन्न की मादकता के कारण शरीर में आलस्य आने लगता है जिससे आध्यात्मिक शक्ति नष्ट होने लगती है। व्रत से हमारा शरीर और मन शुद्ध बनता है आत्मविश्वास बढ़ता है तथा संयम की वृत्ति का भी विकास होता है। महाराज जी ने बताया कि ऋषि मुनियों ने सप्ताह में एक समय, पंद्रह दिन में एक दिन तथा छ: महिने में नौ दिन अल्पाहार या फलाहार कर रहने की बात कही है जिससे शरीर को आराम मिले, पाचन तंत्र ठीक बना रहे तथा बीमारियों से दूर रहें। इसका पालन करते हुये अनेक लोग सप्ताह में एक दिन व्रत, पंद्रह दिन में एकादशी तथा छ: महिने में नवरात्रि का व्रत करते हैं। चिकित्सकों के मत में भी व्रत और उपवास रखने से अनेक शारीरिक, मानसिक बीमारियों में लाभ मिलने की सलाह दी जाती है। जो मनुष्य अपनी कर्म इंद्रियों पर संयम कर लेता है उसे ज्ञानइंद्रियों पर संयम रखने में कठिनायी नहीं होती। रूप, रस, गंध आदि कर्मइंद्रियाॅ ही लोभ, विकार आदि उत्पन्न करती हैं जिसे व्रत के माध्यम से संयमित किया जाता है। उपवास दो शब्दों से मिलकर बना है उप का अर्थ है समीप और वास का अर्थ है बैठना अर्थात् देवता के सामने तन्मयतापूर्वक बैठना। उपवास से इंद्रियों, मन, चित्त को परमात्मा में लगाना जीवन को परिपक्व बनाना तथा साधना को दृढ़ करना संभव है। एकादशी के दिन अन्न में पाप का निवास माना गया है इसलिये बाल, वृद्ध, रोगी को छोड़कर अन्य को इस दिन अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिये। इस प्रकार व्रत से आत्मसोधन और शक्ति दोनों लाभ प्राप्त होते हैं।
