छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस पर जिला रत्नांचल साहित्य परिषद ने किया साहित्यिक परिचर्चा.. - fastnewsharpal.com
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छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस पर जिला रत्नांचल साहित्य परिषद ने किया साहित्यिक परिचर्चा..

 छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस पर जिला रत्नांचल साहित्य परिषद ने किया साहित्यिक परिचर्चा..



राजिम

 छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के अवसर पर जिला रत्नांचल साहित्य परिषद द्वारा छत्तीसगढ़ी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्जा कैसे मिले .? इस विषय पर साहित्यिक परिचर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें जिलेभर के लेखक एवं साहित्यकारों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। पटल प्रभारी कवि एवं साहित्यकार संतोष कुमार सोनकर मंडल ने कहा कि छत्तीसगढ़ी प्रदेश के तीन करोड़ जनता का आत्मसम्मान है।

 गांव ने ही इसे सहेज कर रखा है। नाचा, गम्मत, पंडवानी, चंदैनी, लोकगीत के लोक कलाकार, कवि, साहित्यकार ने इसे गति प्रदान किया है। इसे आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए हम सब को अपने स्तर से आवाज बुलंद करने की आवश्यकता है। साहित्य परिषद के जिला  अध्यक्ष वीरेंद्र साहू ने कहा कि छत्तीसगढ़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए हर छत्तीसगढ़िया को अपने हिस्से की लड़ाई लड़ना होगा। इसके लिए इसे व्यवहार में लाना बहुत जरूरी है।  छत्तीसगढ़ी सभी दृष्टिकोण से मजबूत है।पांडुका के लेखक नूतन साहू ने कहा कि छत्तीसगढ़ी भाषा व्याकरण की दृष्टि से समृद्ध है इसके बावजूद राजभाषा का दर्जा दिलाने के लिए लगातार संघर्ष चल रहा है। 28 नवंबर सन 2007 में विधानसभा में सर्वसम्मति से छत्तीसगढ़ राजभाषा संशोधन विधेयक पारित कर राजभाषा का दर्जा दिया गया है किंतु आठवीं अनुसूची के लिए प्रयास अभी तक सार्थक नहीं हुआ है इसके लिए पद्य और गद्य दोनों विधा में रचनाकारों को अधिक से अधिक फोकस करना चाहिए। 

रावड़ के गीतकार एवं प्रयाग साहित्य समिति राजिम के अध्यक्ष टीकमचंद सेन ने कहा कि छत्तीसगढ़ी को आचरण में उतारना जरूरी है कथनी और करनी में अंतर होना चाहिए। छत्तीसगढ़ी को कामकाज की भाषा के साथ ही स्कूल, कॉलेज, सरकारी दफ्तर से लेकर विधानसभा तक लोगों की जुबान में छत्तीसगढ़ी का उपयोग सर चढ़कर हो। तभी राजभाषा की संकल्पना सार्थक होगी। 

कोपरा के लेखक राजेश साहू राज ने कहा कि जब से छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग का गठन हुआ है। अभी तक तीन अध्यक्ष बन चुके हैं। जिनमें पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी, दानेश्वर शर्मा, डॉ.विनय कुमार पाठक हैं उनके द्वारा आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कराने के लिए प्रयास भी किया गया लेकिन सफलता के अनुरूप प्रयास नहीं रहा जिसके कारण अभी तक हमें संविधान की आठवीं अनुसूची में जगह नहीं मिली है। सबकी सहभागिता इस कार्य को सरल बना सकती है।

 राजिम के शायर जितेंद्र सुकुमार साहिर ने बताया कि छत्तीसगढ़ के जितने पड़ोसी राज्य हैं सबकी अपनी भाषा है जो शासकीय  तथा गैर शासकीय कार्य में उपयोग होता है परंतु छत्तीसगढ़ को 20 वर्ष हो गए संघर्ष जारी है। इसके लिए छत्तीसगढ़िया क्रांति से लेकर कई संगठन बनी जो सड़क पर उतरकर संघर्ष किया। राजधानी सहित कई जिलों में रैलियां निकाली गई मगर सुखद परिणाम नहीं मिला। छत्तीसगढ़ी भाषा हर दृष्टिकोण से संपन्न है। छत्तीसगढ़ी में नाटक, कहानी, कविता, गजल के अलावा उपन्यास, महाकाव्य भी लिखे जा रहे हैं। रामायण का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद इस बात को सिद्ध करती है छत्तीसगढ़ी भाषा में साहित्य की कमी नहीं है उन्होंने आगे कहा कि इसके लिए सरपंच से लेकर विधायक, सांसद सभी को एकजुट होकर  आवाज बुलंद करने की आवश्यकता है। 

खुटेरी के साहित्यकार वेदप्रकाश नागरची ने कहा कि बिना बोले हम अपने विचार को प्रस्तुत नहीं कर सकते। इसके लिए भाषा की जरूरत होती है छत्तीसगढ़ी प्राचीन काल से बोली जा रही है छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास के लिए काव्योपाध्याय हीरालाल ने व्याकरण का निर्माण पर इसकी प्रमाणिकता को प्रस्तुत किया। लंबे समय से लोक कलाकार, कवि, साहित्यकार, लेखक छत्तीसगढ़ी भाषा को प्रचारित व प्रसारित कर खूब मेहनत किए हैं लेकिन उन्हें अभी तक जिस ढंग से सम्मान मिलना चाहिए वह तवज्जो नहीं मिली। 

पंचकोशी साहित्य परिषद के लेखक पुरुषोत्तम चक्रधारी ने कहा कि सबसे पहले भारतीय संविधान में 14 भाषाओं को शामिल किया गया था लेकिन बाद में संशोधन करते हुए अब 22 भाषा हो गई हैं। उन्होंने ज्यादा से ज्यादा छत्तीसगढ़ी में वाचन की परंपरा निभाने पर बल दिया। कपसीडीह के लेखक वीरेंद्र ठाकुर ने कहा कि भाषा और संस्कृति दोनों राज्य की पहचान होती है। 1890 ईस्वी में छत्तीसगढ़ी में पहली व्याकरण हीरालाल काव्योपाध्याय ने लिखा। 1939 में शब्दकोश बनकर तैयार हुआ इस तरह से साहित्य और रचना के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ी समृद्ध बना।

 फिंगेश्वर के साहित्यकार थानुराम निषाद ने कहा कि राज्य के विकास में वहां की भाषा महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह संस्कृति को भी परिभाषित करती है। छत्तीसगढ़ी में जो मिठास है वह हमें और कहीं नहीं मिलता है।

 देवभोग के लेखक कृष्ण कुमार अजनबी ने कहा कि छत्तीसगढ़ी बोली को राजभाषा का दर्जा दिलाने हम सब को अपने स्तर से मेहनत करने की जरूरत है अभी तक हम देवनागरी लिपि से काम चला रहे हैं। कई बार छत्तीसगढ़ी में लिखते समय श, स और ष में भ्रामक स्थिति उत्पन्न हो जाती है। जिससे वर्तनी में स्पष्टता नहीं आ पाती।

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