पूर्ण को तो जाना ही नही जा सकता-निर्यापक मुनिश्री सुधासागर जी
पूर्ण को तो जाना ही नही जा सकता-निर्यापक मुनिश्री सुधासागर जी
सुरेन्द्र जैन /धरसीवां
पर्वाधिराज पर्युषण पर के आज दशवें अंतिम दिन उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म पर अपने अनमोल वचन में पूज्य निर्यापक मुनिश्री सुधासागर जी महामुनिराज ने कहा कि पूर्ण को तो जाना ही नही जा सकता प्रस्तुत हैं ब्रह्मचारी महावीर भैया जी द्वारा संकलित आज के अनमोल वचन
जाप-ओं ह्रीं उत्तम ब्रह्मचार्य धर्मांगाय नम:
चन्द्रोदय तीर्थ चांदखेड़ी
**निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव दिव्य ज्ञान के धारी 108 श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन मे कहा*
*सज्जन पुरुष तेरा तेरा हैं मेरा मेरा हैं*
1.पुर्ण को नहीं जान सकते-जो चीज तुम्हें खाना हो खाने में आनंद आ रहा है तो क्रिया क्या हो रहीं हैं उसे पता ही नहीं रहता जब आनंद आता है तो उसे अनुभव ही नहीं होता कि मुंह में क्या है यही आनंद है।परीक्षा नहीं दे रहा हूँ अभी पढ़ाई कर रहा हूँ परीक्षा में लिख तब समय सब भूल जाते हैं परिणाम जव सामने आता है मार्कशीट हाथ हो और जब वह गोल्ड मैडल और एक चावल देख कर पूरी हांडी के सारे चावल पूर्ण का आनंद तो आना ही नहीं यदि हांडी के एक एक चावल को महिलाये मसल मसल के देखेगी तो चावल की जगह भात हो जायेगा पूर्ण को तो जाना ही नहीं जा सकता
2.भोग विलास हेय हैं-अभी तक जितने धर्म थे उनमें पर से निवृति थी सब छोड़ दिया है फिर भी पूर्णतः नहीं हैं ये मेरा स्वभाव नहीं है स्पष्ट दिख रहा है ये क्षयोपशम लव्धि वाला जानता है कि संसार के सब भोग विलास हेय मान लिया तो क्या प्रर्माथ को पा लिया सब जानते हैं कि ये संसार दुख का सागर है हमें भय लग रहा है ये सोलह आदि क्रिया का हैं भय लग रहा है कि ये मुझे छूना ले मुझे नहीं चाहिए ये संसार के सुख वैभव किसी बालक से पूछो ये खा ले तो मना कर देता है लेकिन खाना क्या है पता ही नहीं हैं
3.अब नहीं देखना-आचार्य श्री कहते हैं कि आज तेज रेस नहीं धीरे रेस वाली प्रतियोगिता आख को मन को ज्ञान को धीरो करो मन को इतना दौड़ते हैं कि थक जाते हैं महाराज थोड़ा रूके पैर भी नहीं टेकना झुझलाना नहीं है सब कुछ देख चुका हूँ अब क्या देखना नहीं है भगवान की आख झुकी रहती है ऐसी अनुभूति आये तो कोई बात है
4.ब्रह्म-ब्रह्म का अर्थ है सब तरफ से पूर्ण ब्रहम जिसके अंतर में शामिल हो गया ज्ञान ज्ञेय में अंतर है उसके बाद भी ज्ञान की प्रवृत्ति बनी पा रही जो मार्ग के निर्माता होते हैं उसको ब्रह्मा कहते हैं ध्यान ध्याता ध्येय का विक्लप का भाव हो जाए तो कैसा का भाव करो जब तक हमारी जैसे मैं करता है तब तक सर्व भौमिक शक्ति नहीं बन पाएगी।
5.अंतराल जब तक है वस्तु का भोग नहीं बन सकता रास्ते से चलने को हम कहते हैं कि यात्री ही कहते हैं जबकी यात्रा पर अभी पहुंचे नहीं है महावर्तो के पालन करने वाले को महाव्रती कहते हैं महाव्रत को सही पाल रहा है या नहीं दीक्षा लेते ही महाव्रती कह देते हैं जबकि महाव्रती नहीं हुआ तदरुप होना है रत्नत्रय का पालन करना है अर्थ पुरषार्थ और अर्थ का स्वामी होने दोना मे अन्तर हैं
6.स्थित प्रज-उस चर्या को नमस्कार है जो चर्या विराम ले चुकी हैं जिस क्रिया में अब कोई क्रिया नहीं,विराम ले चुकी है उस चर्या का नाम ब्रह्मचर्य हैं क्रिया का विराम होने का नाम नहीं,स्थित प्रज्ञ होने का नाम,कुछ जाना नहीं।
*प्रवचन से शिक्षा*-पुर्ण जानने की कोशिश करोगे आनंद खत्म हो जाएगा सकंलन ब्र महावीर
