*आज का सुविचार* - fastnewsharpal.com
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*आज का सुविचार*


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💠 *आज का सुविचार*💠
🎋 *..27-08-2020*..🎋

✍🏻बड़ी सोच, हर बड़ी बात को छोटा कर खत्म कर देती है, जबकि छोटी सोच, हर छोटी बात को भी बड़ा कर देती है।
💐 *Brahma Kumaris* 💐
🌷 *ओमशान्ति*🌷

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  💥 *विचार परिवर्तन*💥

✍🏻साँसे किसी का इंतज़ार नहीं करतीं, चलती हैं या, चल देती हैं, चिंता इतनी कीजिए की काम हो जाए पर इतनी नही की जिंदगी तमाम हो जाए मालूम सबको है कि जिंदगी बेहाल है, लोग फिर भी पूछते हैं और सुनाओ क्या हाल है।
🌹 *ओमशान्ति*🌹

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कर्म रूपी कड़ियों से जुड़कर मानव जीवन बनता है । जैसा कर्म वैसा जीवन यह अकाट्य सत्य है । हम जो कुछ करते हैं मानो बीज होते हैं, जो कालांतर में उगकर फल के रूप में हमारे सामने आता है और हमारा भाग्य बन जाता है । करते समय जो कर्म था, लौटते समय वही भाग्य बन जाता है ।

कर्म के तीन स्तर है _ मनसा, वाचा, कर्मणा । मनसा अर्थात् सोचना, वाचा अर्थात् बोलना और कर्मणा अर्थात् शरीर द्वारा कर्म करना ।

मनसा _ हम जिसके प्रति जैसा सोचेंगे, वह व्यक्ति भी हमारे प्रति वैसा भी सोचेगा । कहते हैं विचार भी यात्रा करते हैं । जैसे फोन के नंबर दबाने पर हजारों मील दूर व्यक्ति के फोन में घंटी बज जाती है । यह इलेक्ट्रो मैग्नेटिक वेवज के माध्यम से होता है । इसी प्रकार, हमारे मन में उठे विचार से हजारों मील दूर बैठे व्यक्ति के विचार प्रभावित हो सकते हैं । विचार एक सेकण्ड में कहीं से कहीं पहुंचकर अपना प्रभाव डाल सकते हैं । अच्छे विचारों का प्रभाव अच्छा और बुरे विचारों का प्रभाव पूरा होता है । वास्तव में जब हम किसी के बारे में कुछ भी सोचते हैं तो हमारे विचारों के प्रकंपन सूक्ष्म प्रभाव उस व्यक्ति की दिशा में जाकर उसके विचारों को प्रभावित करते हैं जिसका पता उसे भी नहीं पड़ता कि यह प्रभाव कहां से आ रहा है परंतु उसके विचार प्रभावित अवश्य होते हैं ।

भगवान कहते हैं, भावना का फल अवश्य मिलता है । आप सबकी श्रेष्ठ भावना है, स्वार्थ रहित भावना है, रहम की भावना है, कल्याण की भावना है । ऐसी भावना का फल नहीं मिले,  यह नहीं हो सकता । जब बीज शक्तिशाली हो तो फल जरूर मिलता है । सिर्फ इस श्रेष्ठ भावना के बीज को सदा स्मृति का पानी देते रहो तो समर्थ फल, प्रत्यक्ष फल के रूप में अवश्य प्राप्त होता ही है । क्वेश्चन नहीं, होगा या नहीं होगा । सदा समर्थ स्मृति का पानी है अर्थात् सर्व आत्माओं के प्रति 
शुभ भावना है तो विश्व शांति का प्रत्यक्ष फल मिलना ही है ।

वाचा _ हम जो बोलते हैं वह भी कर्म है और उसका फल भी बीज के अनुरूप ही निकलता है । इसीलिए कहा गया है _ 
शब्द संभल के बोलिए, शब्द के हाथ न पाँव ।
 एक शब्द बने औषधि और एक शब्द करे घाव ।।

मान लीजिए हजारों की सभा में हमने एक शब्द उछाला कि आप सभी बहुत अच्छे हैं, तो हमारे इस एक बीज के हजारों फल बनकर हमारे पास वापस लौटेंगे । सामने बैठे सभी कहेंगे, आप भी बहुत अच्छे हैं । हमारा दिया हुआ ही हमारे पास वापस आ गया । हम जो बोलेंगे, प्रतिध्वनि हो कर वही लौट आएगा । आज हमारे पास जो कुछ है वह हमारा दिया हुआ ही लौटा है, चाहे वह अच्छा है या बुरा है । जैसे हम बाजरे के एक दाने से हजारों दाने पाते हैं, मकई के दाने से भी हजारों दाने पाते हैं, इसी प्रकार, एक नकारात्मक शब्द यह सकारात्मक शब्द बोला तो बिल्कुल वैसे ही हजारों शब्द उग  आएंगे ।

कर्मणा _ शरीर और इसकी इंद्रियों द्वारा किए जाने वाले कर्मों को कर्मणा कर्म कहा जाता है । एक राजस्थानी कहानी से इसको अच्छे से समझ सकते हैं । पुराने जमाने की बात है, एक गरीब ठठेरा तीर्थ यात्रा के लिए गया और अपने जीवन भर की कमाई, गांव के ठाकुर के पास रख गया । कई तीर्थों की यात्रा करके वह छह माह बाद लौटा और ठाकुर जी से अपना धन मांगा । ठाकुर जी के देने से मुकर गए । जब इस गरीब ने रोना चिल्लाना शुरू किया तो ठाकुर जी ने अपने आदमियों को बुलाकर इसे धक्के मार कर निकालने का आदेश दे दिया । जब आदमी इसे पकड़ कर ले जाने लगे तो ठाकुर जी की दहलीज पर यह कहते हुए ठठेरे के प्राण निकल गए कि यह धन तो मैं लेकर ही रहूंगा ।

ठाकुर जी ने अंतिम संस्कार करवा दिया और सोचा बला टली । छह मास बाद ठाकुर जी को पोता जन्मा पर जन्म से बीमार । इसके इलाज में पानी की तरह पैसा बहने लगा । बालक जब आठ साल का हुआ तो यह कह कर संसार से विदा हो गया कि ठठेरे के रूप में मैंने जो धन आपको दिया था, वह मैंने अपने शरीर पर लगवा लिया । अब आप पर मेरा कोई कर्ज नहीं बचा इसीलिए मैं जा रहा हूं ।

कहानी हमें बता रही है कि धोखे, झूठ, ठगी से प्राप्त धन बीमारी में लगकर समाप्त हो गया है ऐसा धन आंधी की गति से आकर तूफान की गति से चला जाता है । बरकत केवल इमानदारी से किए  गए कर्मो से ही होती है ।
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