*सुंदर सत्संग का आयोजन पाटेश्वर धाम*
सुंदर सत्संग का आयोजन पाटेश्वर धाम
प्रतिदिन की भांति आज भी अद्भुत और सुंदर सत्संग का आयोजन पाटेश्वर धाम के संत राम बालक दास जी द्वारा उनके सीता रसोई संचालन ग्रुप में प्रातः 10:00 से 11:00 बजे और दोपहर 1:00 से 2:00 बजे संचालित किया गया जिसमें सभी भक्तजनों ने अपनी जिज्ञासाओं को रखा और उसका समाधान प्राप्त किया
आज के सत्संग में संत राम बालक दास जी ने प्रभु की भक्ति का महत्व बताते हुए कहा की रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने हर स्थान पर यह संकेत दिए हैं कि संसार में नश्वर पदार्थ के पीछे चाहे जितना भागे परंतु एक समय ऐसा आएगा जब नीरसता महसूस होगी जीवन में सरसता समाप्त हो जाएगी जीवन में जिन संबंधों नातो मे आपको रस प्राप्त होता है वही नीरस लगने लगेंगे तुलसीदास जी कहते हैं कि ऐसी स्थिति आने के पूर्व ही आप सरस जीवन की ओर बढ़े, सरस जीवन जो अखंडता और अनश्वर हो जो मृत्यु तक ही नहीं अगले जन्म तक हमारे स्मृतियों के साथ हो, उसके लिए हरि भजन की नितांत आवश्यकता होती है आप पानी को भी मथ कर मक्खन निकाल सकते हैं और घास से भी तेल निकाल सकते हैं लेकिन हरि नाम के भजन के बिना ईश्वर की प्राप्ति असंभव है इसीलिए हर क्षण हर समय सोते उठते बैठते खाते-पीते भगवान श्री राम का नाम भजे ताकि ईश्वर की प्राप्ति हो सके
पुरुषोत्तम अग्रवाल जी थानखमरिया ने जिज्ञासा रखी कि संसार रूपी सागर से कोई अपने आप तर नहीं सकता चाहे वह ब्रह्माजी जैसे सृष्टि कर्ता हो या शिवजी जैसे संहार कर्ता,
इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए बाबा जी ने बताया कि यह तथ्य संसार रूपी सागर हेतु नहीं कहा जा सकता यह भव निधि के पार जाने के विषय में कहा गया है इस भव निधि से आप अपने आप नहीं तर सकते भव निधी केबल मृत्यु लोक को नहीं कहते सात तल ऊपर सात तल नीचे और बीच में धरातल इस प्रकार इस स्थल का निर्माण हुआ नारदजी मृत्युलोक की सीमा से ऊपर है लेकिन नारद जी को भी मोह हो जाता है स्वयं वैराग्य मूर्ति राजर्षि नारदजी को मोह हो जाना यहां सिद्ध करता है कि जो भव निधि कही जाती है यह मृत्यु लोक से ऊपर उठकर संपूर्ण ब्रह्मांड है जो कि वैष्णवी माया के वश में है
अब विषय आता है कि क्या त्रिदेव को भी मोह हो सकता है और त्रिदेव के लिए भी भव निधि प्रभावी है, नहीं वास्तव में यह उनके लीला रूप के लिए कहा गया है भगवान शंकर ने हनुमान रूप लिया तो हनुमान रूप मे भगवान राम की भक्ति प्राप्त करने हेतु सूर्यनारायण को गुरु बनाना पड़ा है इसी तरह भगवान विष्णु ने भी कई अवतार लिए बराह बामन कृष्ण राम जी आदि प्रत्येक अवतार में तो नहीं परंतु अधिकांश अवतार में उन्होंने भी गुरु की शरण प्राप्त की राम जी कृष्ण जी ने गुरुदेव से ही समस्त दीक्षा ग्रहण कर रावण कंस जैसे राक्षसों का नाश किया तो " गुरु बिना भव निधि तरही न कोई जो बिरंचि संकर सम हुई " यह शब्द त्रिदेव हेतु नहीं उनकी लीला रूपों के लिए कहे गए हैं
रामचरितमानस के गायन कर्ता रामफल जी ने जिज्ञासा रखी की रामचरितमानस को सर्वप्रथम सुनने वाला श्रोता कौन था प्रभु इसको स्पष्ट करें, रामचरितमानस के प्रथम श्रोता का नाम बताते हुए बाबा रामबालक दास जी ने स्पष्ट किया कि यह भगवान शंकर जी द्वारा सर्वप्रथम भगवती माता पार्वती को सुनाया गया था तत्पश्चात भगवती माता सीता ने ऋषि रूप में हनुमान भगवान को इसे प्रदान किया था फिर यह कागभुशुण्ड जी द्वारा गरुड़ जी को सुनाई गई और तत्पश्चात के हमारे समक्ष उपलब्ध है
सतर राम जी ने जिज्ञासा रखी की पक्षीराज गरुड़ जी को राम नाम की महिमा का ज्ञान किस प्रकार हुआ, इस प्रसंग को स्पष्ट करते हुए श्री राम बालक दास जी ने बताया कि रावण और मेघनाथ के द्वारा श्री राम जी को बंधक बना लिया गया तब हनुमानजी ने गरुड़ जी को प्रस्तुत किया और उनको बंधन से गरुड़ जी ने मुक्त कराया तब गरूढ़ जी को मोह हुआ कि जो समस्त सृष्टि को बंधन मुक्त कराते हैं वह कैसे बंधन में बंध गए तब उन्होंने गुरु शरण में जाने का विचार रखा
वे शिव जी के पास गए शिवजी ने उन्हें काग भुसुंडि के समक्ष भेजा तब वह नीलांचल पर्वत पहुंचे जहां मोह प्रवेश भी नहीं कर सकता था
काग भुशुण्डि जी द्वारा राम नाम की महिमा का महत्व उन्होने वहां प्राप्त किया
नागेश्वर साहू जी ने सुंदरकांड के दोहे "तुम पितु सरस भलेही मोही मारा... इन पंक्तियों के भाव को स्पष्ट करने की विनती बाबाजी से की, इन पंक्तियों के भाव के स्पष्ट करते हुए बाबा जी ने बताया कि सुंदरकांड का यह दोहा जब विभीषण भगवान श्री राम जी की शरण में जाते हैं तो वह रावण जी को यह समझाते हैं कि तुम ने भले ही मुझे पिता के समान होते हुए मारा
क्योंकि तुम मेरे बड़े भाई हो तो तुम मेरे पिता के समान हुये, और तुमने मुझे मारा, परंतु फिर भी मैं तुम्हें इस स्तय से अवगत कराता हूं कि तुम्हें श्री राम जी की शरण में चले जाना चाहिए इस प्रकार समझाते विभीषण जी वहां से चले गए और तभी लंका में निवास करने वाले सभी रावण राक्षस गण प्राणहीन शव
के समान हो गए इस प्रकार जब भगवान श्रीराम ने भी एक समय विश्वामित्र जी से यह प्रश्न किया कि मैंने आपकी शस्त्र विद्या द्वारा एक ब्राह्मण रावण की हत्या की है तब विश्वामित्र जी ने उन्हें समझाया कि जब विभीषण जी ने लंका को छोड़ा था तभी वहां पर रहने वाले सभी लोग शव के समान हो गए थे इस प्रकार आप ने शव पर प्रहार किया जिसका आपको कोई ब्रम्ह हत्या का दोष नहीं लगता
9425510729 पर मैसेज करके आप भी इस सत्संग में जुड़े
इस प्रकार आज का आनंद दायक जिज्ञासा को तृप्त करने वाला सत्संग पूर्ण हुआ
जय गौ माता जय गोपाल जय सियाराम
