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*स्वयं का महत्व - प्रसन्नता का गेयर हमेशा अपने हाथ में रखे ब्रह्मा कुमार नारायण भाई*

 स्वयं का महत्व - प्रसन्नता का गेयर हमेशा अपने हाथ में रखे ब्रह्मा कुमार नारायण भाई



अलीराजपुर

जब भी हमें दुख मिलता है, हम् सोचते हैं, लोग हमें दुख दे रहे हैं। वह हमारी भ्रांति है। कोई आपको क्यों दुख देने चला? किसी को क्या प्रयोजन है? किसको फुरसत है? लोगों को अपना जीवन जीना है कि आपको दुख देने का उपाय करना है?

 नहीं, कहीं कोई आपने निर्मिति की है; कहीं कोई प्रतिध्वनि आपने फेंकी थी, वह आज वापस लौट रही है। उसे इस भाति जो चुपचाप स्वीकार कर लेता है, उसके दुखों के जो अतीत के बोझ हैं, वे कट जाते हैं और नए बोझ निर्मित नहीं होते।

 और अगर कभी आपको कोई सुख मिलता है, तो भी आप जानना कि आपने कोई सुख बांटा होगा, जाने या अनजाने, उसका प्रतिफल है।

अगर हम अपने सुखों और दुखों को अपने ही कर्मों का प्रतिफल समझ लें, तो कर्म का सिद्धात हमारी समझ में आ गया।_




 कर्म का सिद्धांत बस सार में इतना ही है कि मुझे वही मिलता है, जो मैंने किया है। मैं वही फसल काटता हूं जो मैंने बोई है; अन्यथा कुछ भी हो नहीं सकता। ऐसी चित्त की दशा बनती चली जाए, तो आप धीरे धीरे आसुरी संपदा से मुक्त होकर दैवी संपदा में प्रवेश कर जाएंगे। इससे विपरीत अपने को आप आदत बनाते रहें, तो आसुरी संपदा में धीरे धीरे थिर हो जाएंगे। ऐसे थिर हो गए लोग, , महानरक में गिर जाते है। यह विचार इंदौर से पधारे जीवन जीने की कला के प्रणेता ब्रहमा कुमार नारायण भाई ने दीपा की चौकी पर स्थित ब्रह्मा कुमारी सभागृह में प्रसन्नता का गियर अपने हाथ में विषय पर नगर वासियों को संबोधित करते हुए बताया कि

 वैवाहिक जीवन पर आधारित एक लाईफ स्किल सेशन में स्पिकर ने दर्शकों में उपस्थित एक महिला से पुछा "क्या आपके पति आपको खुश रखते हैं?" इस प्रश्न पर उस महिला का पति बड़ा ही आश्वस्त था। क्योंकि उनका वैवाहिक जीवन काफी सफल था। उसे पता था उसकी पत्नी क्या बोलेगी क्योंकि पुरी शादीशुदा जिंदगी में उसकी पत्नी ने कभी भी किसी भी बात के लिए कोई शिकायत नहीं कि थी। महिला ने बड़ी ही गंभीर आवाज में जवाब दिया - "नहीं मेरे पति मुझे प्रसन्न नहीं रखते।" पति बहुत ही चकित था और वह मौजूद बहुत से दूसरे लोग भी। परन्तु उसकी पत्नी ने बोलना जारी रखा - "मेरे पति ने मुझे कभी खुश नहीं किया और ना ही वे कर सकते है पर फिर भी मैं खुश हूँ"। मैं खुश हूँ या नहीं, यह मेरे पति पर नहीं बल्की मुझ पर निर्भर है। मैं ही एकमात्र व्यक्ति हूं जिस पर मेरी खुशी निर्भर करती है।

 मेरी जिन्दगी की हर परिस्थिति और हर पल में मै खुश रहना पसंद करती हूँ, क्योंकि अगर मेरी खुशी किसी दूसरे व्यक्ति, किसी वस्तु या किसी हालात पर निर्भर करती है तो यह मुझे पसंद नहीं और इससे मुझे बहुत तकलीफ होती है।

जीवन में जो कुछ भी है वह हर पल बदलता रहता है व्यक्ति, समृद्धि, पैसा, शरीर, मौसम, ऑफिस में बास, सुख-दुख, दोस्त और मेरी शारीरिक व मानसिक अवस्था भी। यह अन्तहीन सुची है और यही हमें प्रभावित करना चाहती है।

 मुझे खुश रहने का फैसला करना होगा चाहे जीवन में कुछ भी हो। मेरे पास साडियाँ ज्यादा है या कम पर मैं खुश हूँ। चाहे मैं घर में अकेली रहूँ या बाहर घुमने जाऊँ, मैं खुश हूँ। चाहे मेरे पास बहुत पैसा हो या नहीं पर मैं खुश हूँ। चाहे टीवी पर मेरा पसन्दीदा सीरियल आ रहा है या क्रिकेट मैच, पर मै सदा खुश हूँ। मैं शादी-शुदा हूँ पर मैं तब भी खुश थी जब मैं सिंगल थी। मैं अपने स्वयं के लिए खुश हूँ।

मैं अपने जीवन को इसलिए प्यार नहीं करती क़ि वह दुसरो से आसान है बल्कि इसलिए कि मैने स्वयं खुश रहने का फैसला किया है।

 जब प्रसन्न रहने का दायित्व मैं अपने आप पर लेती हूँ तब मैं अपने पति के कंधों से अपनी देखभाल करने का बोझ हल्का करती हूँ। यह सोच मेरे जीवन को बहुत आसान बनाती है और यह हर किसी को भी बना सकती है।और यही एकमात्र कारण है, हम बहुत सालों से सफल और प्रसन्न वैवाहिक जीवन का आनन्द ले रहे है।

 अपनी प्रसन्नता का गेयर किसी के हाथ में मत दीजिए। प्रसन्न रहीये, चाहे जीवन में बहुत गर्मी हो या बरसात। चाहे आपके पास बहुत पैसा न हो, चाहे कोई आपको हर्ट करे।

 पति चाहे स्टेयरिंग सिट पर बेठे हो और गाड़ी सपाट रोड पर दौड़ रही हो या ऊबड़-खाबड़ सड़क पर हिचकोले खा रही हो, गियर हमेशा प्रसन्नता मॉड में ही रखे। आपको कोई प्यार भी नहीं करेगा कोई भी सम्मान नहीं देगा जब तक आप स्वयं अपने आप को महत्व नहीं देगी। इसलिये आपको स्वयं को जानना बहुत जरूरी है, स्वयं के महत्व की जानकारी बेहद जरूरी हैं।

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