* जीवन की तुलना किसी से नहीं करें इसी से आनंद अपनापन खत्म होता है --ब्रह्माकुमार नारायण भाई*
जीवन की तुलना किसी से नहीं करें इसी से आनंद अपनापन खत्म होता है --ब्रह्माकुमार नारायण भाई
अलीराजपुर
,यह संसार समय के चक्र से बँधा आगे चलता जा रहा है
*इस संसार में न कोई सदा रहा है और न ही रह सकता है
*हम से पहले अनेक लोग यहाँ से जा चुके हैं , और हमे भी एक दिन यह संसार छोड़कर चले जाना है
*इन्सान का जीवन-काल अल्प है जो हमे कुछ समय के लिये ही खास उद्देश्य की पूति॔ के लिये ही मिला है
*हमारे पास समय बहुत कम है और हम एक बार जन्म लेने के बाद कभी भी मृत्यु से भाग नही सकते
*और हमने तो अपने जीवनकाल का अधिक भाग पहले से ही गुजार चुके है
*हमारा जीवन तेजी से मौत की और बढ़ता जा रहा है और यह हमारा अनमोल मनुष्य-जन्म व्यथ॔ ही संसार के कामों में बिता जा रहा है*आज हम अपना कीमती समय व्यर्थ कामों में गँवाकर अपने खुद के साथ बहुत बड़ा अन्याय कर रहे है। यह विचार इंदौर से पधारे जीवन जीने की कला के प्रणेता ब्रह्मा कुमार नारायण भाई ने दीपा की चौकी में स्तिथ ब्रहमा कुमारी सभागृह में मानव जीवन का महत्व विषय पर नगरवासियों को संबोधित करते हुए बताया कि
खूबसूरत है वो हाथ
*जो मुश्किल के वक़्त
*किसी का सहारा बन जाये
*खूबसूरत है वो जज्बात
*जो दूसरों की भावनाओं
*को समझ जाये
*खूबसूरत है वो दिल
*जो किसी के दुःख मे
*शामिल हो जाये
तुलना के खेल में मत उलझो
*क्योंकि इस खेल का कहीं कोई
*अंत नही जहाँ तुलना की
*शुरुआत होती है वही से आनंद औरअपनापन खत्म हो*हमारे कर्म काटने के लिए ही हमको दु:ख दिये जाते है, दु:ख का कारण तो हमारे अपने ही कर्म है, जिनको हमें भुगतना ही है। यदि दु:ख नही आयेगें तो कर्म कैसे कटेंगे?एक छोटे बच्चे को उसकी माता साबुन से मलमल के नहलाती है जिससे बच्चा रोता है, परंतु उस माता को, उसके रोने की, कुछ भी परवाह नही है, जब तक उसके शरीर पर मैल दिखता है, तब तक उसी तरह से नहलाना जारी रखती है, और जब मैल निकल जाता है, तब ही मलना, रगड़ना बंद करती है।वह उसका मैल निकालने के लिए ही उसे मलती, रगड़ती है, कुछ द्वेषभाव से नहीं ।*माँ उसको दु:ख देने के अभिप्राय से नहीं रगड़ती, परंतु बच्चा इस बात को समझता नहीं इसलिए इससे रोता है।*इसी तरह हमको दु:ख देने से परमेश्वर को कोई लाभ नहीं है, परंतु हमारे पूर्वजन्मों के कर्म काटने के लिए, हमको पापों से बचाने के लिए और जगत का मिथ्यापन बताने के लिए वह हमको दु:ख देता है।
अर्थात् जब तक हमारे पाप नहीं धुल जाते, तब तक हमारे रोने चिल्लाने पर भी परमेश्वर हमको नहीं छोड़ता ।*इसलिए दु:ख से निराश न होकर, हमें मालिक से मिलने के बारे मे विचार करना चाहिए और परमात्मा शिव का सुमिरन ध्यान करना चाहिए।

