जीवन में सबसे कठिन बात है स्वयं को स्वीकार कर लेना ब्रह्माकुमार नारायण भाई
जीवन में सबसे कठिन बात है स्वयं को स्वीकार कर लेना ब्रह्माकुमार नारायण भाई
अलीराजपुर
अहंकार को उससे बड़ी चोट और किसी बात से नहीं लगती जितना स्वयं की गलती को स्वीकार करने से क्योंकि अहंकार है सदा–कुछ और–कुछ और–ज्यादा होने की महत्वाकांक्षा। जितना धन है तुम्हारे पास, अहंकार कहता है, और ज्यादा हो सकता है। इसे ज्यादा करो। तुम्हारी योग्यता ज्यादा है और धन कम है। यह तुम्हारे अनुकूल नहीं है, योग्य नहीं, कि इतने थोड़े से तुम तृप्त हो जाओ।
और ऐसा नहीं है कि धन बढ़ जायेगा तो तुम तृप्त हो जाओगे। कितना ही होगा धन, अहंकार बार-बार कहेगा, तुम्हारी योग्यता ज्यादा थी, अयोग्य तुमसे आगे खड़े हैं। जिन्हें भीख मांगनी चाहिए थी, वे सम्राट हो गये हैं। और तुम, जिन्हें सम्राट होना चाहिए था, केवल इतने पर अटके हो?
अहंकार ज्यादा और ज्यादा–और ज्यादा होने का स्वप्न देता है। और अहंकार यह मानने को कभी राजी नहीं होता कि तुमने अपनी योग्यता के बराबर पा लिया। यह तो असंभव ही है कि अहंकार मानने को राजी हो कि मैंने अपनी योग्यता से ज्यादा पा लिया। तुम्हारी पात्रता अनंत मालूम होती है, और जो मिलता है वह बहुत क्षुद्र मालूम होता है। यही दौड़ है–अस्वीकार!
और धन के संबंध में नहीं, सभी संबंधों में, सभी दिशाओं में; चाहे ज्ञान हो, चाहे यश हो, चाहे पद हो। ये सब संसार की चीजें तो हमारी समझ में भी आ जाती हैं कि यहां दौड़ है, और दौड़ छोड़ने जैसी है। क्योंकि दौड़ से सिवाय अशांति के और क्या मिलेगा? और फिर न तृप्त होनेवाली दौड़ है। इसका कोई अंत नहीं है। तुम जहां भी रहोगे, इतने ही अतृप्त रहोगे, जितने तुम यहां हो। यह विचार इंदौर से पधारे जीवन जीने की कला के प्रणेता ब्रह्माकुमार नारायण भाई ने दीपा की चौकी में स्थित ब्रह्माकुमारी सभागृह में जीवन का असली धन भाग दौड़ में नहीं विराम में है इस विषय पर नगर वासियों को संबोधित करते हुए बताया कि
संसार में कोई भी पदार्थ ऐसा नहीं जो स्थिर रहता है । उसमें कुछ न कुछ परिवर्तन सदैव होता रहता है ।इसी तरह समाज में भी परिवर्तन होता है , क्यूंकि समाज परिवर्तनशील है । *यदि हम समाज में निरंतरता को बनाए रखना चाहते हैं तो हमें परिवर्तनोन्मुख बनना ही होगा तभी हमारी प्रगति संभव है । इसके उलट , यदि हम परिवर्तन को स्वीकार नहीं करते , तो हम रुढीवादी हो जाते हैं । ठहरे हुए जल की तरह , जिसका सडना निश्चित है । जो रुढीवादी लोग परिवर्तनों को स्वीकार नहीं कर पाते अंदर ही अंदर दुखी होकर स्वयं को जलाते रहते हैं । परिवर्तनों को स्वीकार करना साहस का काम है , क्योंकि इसके लिए गतिशील - कर्मशील होना होगा , जीवन में आई मुश्किलों से संघर्ष करना होगा । संघर्ष ही हमारे जीवन में विकास के बीज बोता है ।


