सोचने की कला द्वारा जीवन की बीमारियों व समस्याओं का परिवर्तन-- ब्रह्मा कुमार नारायण भाई - fastnewsharpal.com
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सोचने की कला द्वारा जीवन की बीमारियों व समस्याओं का परिवर्तन-- ब्रह्मा कुमार नारायण भाई

 सोचने की कला द्वारा जीवन की बीमारियों व समस्याओं का परिवर्तन-- ब्रह्मा कुमार नारायण भाई  



    अलीराजपुर 

 किसी भी कार्य को करने की एक कला होती है। जब कार्य उसी प्रमाण किया जाता है तो कम खर्च कम ऊर्जा और कम समय में उसे सुंदर बना सकते हैं। ऐसे कार्य से सबको सुख मिलता है। संसार में अनेक प्रकार की कलाएं हैं, इनको सीखने के लिए मानव अपना बहुमूल्य समय धन खर्च करता है। सबसे ऊंची कला कहे वह है सोचने की कला। ब्रहमा कुमारी मै इसी कला का ज्ञान दिया जाता है।



 कोई चित्र इतना खूबसूरत नहीं होता तो एक कलाकार उस में रंग भर कर उसे आकर्षक बना देता है। इसी प्रकार हमारे मन में भी यदि किसी के प्रति गलत भावना बनी हुई है तो अब उसमें शुभ भावना, शुभकामना के  रंग भर कर हम भी उसे आकर्षक बना सकते हैं। इससे स्वयं को भी एवम उसको भी निश्चित रुप से सुख मिलेगा। यह विचार इंदौर से पधारे जीवन जीने की कला के प्रणेता ब्रहमा कुमार नारायण भाई ने महात्मा गांधी मार्ग पर स्तिथ ब्रहमा कुमारी सभागृह में सोचने की कला विषय पर नगर वासियों को संबोधित करते हुए बताया कि एक शोध के अनुसार मनुष्य की 80 प्रतिशत संकल्प शक्ति व्यर्थ जा रही है। मुश्किल से 20 प्रतिशत काम में लगती है। मनुष्य एक मिनट में 27 या 30 विचार उत्पन्न करता है इनमें से अगर 80 प्रतिशत व्यर्थ चले गए तो काम के तो मात्र 5 या 6 हि बचे। अतः संकल्प पर ध्यान देने की बहुत जरूरत है।



 कुछ व्यर्थ चिंतन चल रहा है जो हमारी ऊर्जा को नष्ट कर रहा है। जैसे जंगल में भटक रहे  मानव को जब तक दिशा नहीं मिलती तब तक उसका समय, शक्ति व्यर्थ जाते रहते हैं। आज अधिकाश बीमारियां, तनाव, चिंता, समस्याओं का कारण यही हमारा कमजोर मन बनता जा रहा है। मान लीजिए किसी के बहुत व्यर्थ संकल्प चल रहे हैं, इसने ऐसा क्यों किया ,मेरे साथ ऐसा क्यों होता है, इस को बदलना चाहिए आदि आदि। ऐसे में बुद्धि में सृष्टि नाटक के यथार्थ ज्ञान कोई इमर्ज करो कि सृष्टि नाटक में हर एक का अपना अपना पार्ट है। सब का पार्ट सही है ।यह नाटक समय प्रमाण चल रहा है। इसको बदला नहीं जा सकता, परंतु स्वीकार कर के चलना है। सकल्पो से हमारे आसपास का वायुमंडल श्रेष्ठ बनता है। हमारे हर संकल्प में रचनात्मक शक्ति होती है, संकल्प के आधार पर शरीर रूपी प्रकति भी बदल जाती है। यदि कोई पूरी लगन  से बार-बार यह संकल्प करता है कि मैं बीमार हूं तो बीमारी के कीटाणु उस शरीर में बन जाते हैं। जैसे स्थूल धन का एक-एक पैसा खर्च करते समय कितना ध्यान देते हैं, बजट बनाते हैं। इतना ही ध्यान अपने एक एक संकल्प पर रहता है? अपने संकल्प को श्रेष्ठ बनाने का आधार है । अटेंशन रुपी पहरेदार सदा सुजाग रहे, समय प्रति समय अपने संकल्प की दिशा और गति को चीज करें ।बार-बार देखें कि मेरे संकल्प ज्ञान युक्त कल्याणकारी है। श्रेष्ठ संकल्प नरक को स्वर्ग और मानव को देव बना देते हैं। श्रेष्ठ जीवन का आधार श्रेष्ठ कर्म और श्रेष्ठ कर्म का आधार श्रेष्ठ चिंतन है।कहा गया है, सोच को बदलो तो सितारे बदल जायेंगे, नजर को बदलो तो नजारे बदल जाएंगे ।किस्ती बदलने की जरूरत नहीं तुम्हें, दिशा को बदलोगे तो किनारे बदल जायेंगे।

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