प्राचीन परंपरा को संजोकर रखे हैं के.आर. सिन्हा -
प्राचीन परंपरा को संजोकर रखे हैं के.आर. सिन्हा
तेजस्वी यादव/छुरा
हम सभी जानते हैं कि हमारा भारत देश, कृषि प्रधान देश है | भले ही वर्तमान परिवेश में आधुनिकता ने पैर पसार लिया है परंतु प्राचीन समय में जहां कृषि कार्य गौ आधारित होती थी। हल चलाने से लेकर धान मिसाई तक पूरा कार्य गौवंश द्वारा होता था। खेती के लिए आवश्यक खाद भी गौवंश से ही प्राप्त होता था। इसी परंपरा का अभिन्न अंग है "टाटी"। 'टाटी' घास-फूस, भोड़ इत्यादि को मुआ रस्सी से पिरोकर बनाया जाता है। इसी टाटी में कृषक अपने गोवंश को सोहई बांधकर (श्रृंगार करके) पवित्र खिचड़ी खिलाते थे। छप्पन भोग के बाद इसका उपयोग धान एकत्रित करने के लिए बैलगाड़ियों में और खेत-खलिहान में उपयोग होता था। वर्तमान में इसका स्वरूप बदल गया है क्योंकि इसे बनाना अति जटिल कार्य है। एक विशेष तकनीक से यह बनता है, समय भी अधिक लगता है इसलिए टाटी बनाना और इसमें भोग खिलाना विरले जगहों पर ही देखने को मिलती है।
किंतु आज भी इस प्राचीन परंपरा को सेवानिवृत्त व्याख्याता के.आर. सिन्हा पूरी सिद्दत से निभाते आ रहे हैं। गोवर्धन पूजा के दिन घास-फुस लाकर सुबह से ही इसकी जुगत में लग जाते हैं। के.आर. सिन्हा कहते हैं कि टाटी बनाने में और उसमें गौ माता को भोजन कराने में विशेष आनंद की अनुभूति होती है। प्रकृति से जुड़ाव का अहसास इसे और भी व्यापक, मोहक बना देता है। सिन्हा आगे कहते हैं कि इसे मैं विशेष रुचि के साथ बनाता हूं ताकि युवा पीढ़ी इस परंपरा को सीखे और आगे बढ़ाए। हमारी छत्तीसगढी संस्कृति में ऐसे ही कई छोटी-छोटी मगर व्यापक अर्थों के साथ कई परंपराएं चली आ रही हैं जिसे भावी पीढ़ी तक पहुंचाना हम बुजुर्गों की महती जिम्मेदारी है।