पुण्य बढाना है तो सहयोग देना है सहयोग लेना नहीं,पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के नवमें दिन उत्तम आकिंचन धर्म पर पूज्य निर्यापक मुनिश्री सुधासागर जी के अनमोल वचन
पुण्य बढाना है तो सहयोग देना है सहयोग लेना नहीं,पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के नवमें दिन उत्तम आकिंचन धर्म पर पूज्य निर्यापक मुनिश्री सुधासागर जी के अनमोल वचन
सुरेन्द्र जैन /धरसीवां
पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के नवमें दिन उत्तम आकिंचन धर्म पर अपने अनमोल वचनों में पूज्य निर्यापक मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि पुण्य बढाना है तो सहयोग देना है सहयोग लेना नही ।
जाप-ओं ह्रीं उत्तम आकिंचन धर्मांगाय नम:
चन्द्रोदय तीर्थ चांदखेड़ी
**निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव जैन धर्म परम प्रभावक108 श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन मे कहा*
*वस्तु का त्याग नहीं आज वस्तु के त्याग के कारण को छोड़ना है*
1.पाप को समयहैं-पुण्य बड़ाना है तो सहयोग देना है सहयोग लेना नही है सहयोग लेने से पुण्य कम हो जाता है दिनभर काम करते रहते है मन्दिर जाने को तक फुर्सत नहीं है ऐसे ही अपनी आत्मा को जानने के अलावा किसी को देखने की फूर्सत नहीं है कोई कहें मुझे पड़ा दो तो कह दो अभी पड़ा ही नहीं मैं कहा से पड़ाऊ लेकिन पड़ाने में आनंद आता है अहम् की पुष्टि होती हैं अकसर कर अपना कोर्स किये बिना दुसरो को समझा रहे हैं हमने अपने को ही नहीं समझा और दुसरो के लिए समझाने में लग गये
2.अपने ही विनाश अपनो का- अपनी करनी आप करे दुख औरन के धरता हम दुसरो के सिर अपनी आफत रख देते हैं बहुत सारे कुल्हाडी आ रहे हैं जब तक अपनी जाति का कोई बैट नहीं बनेगा तब तक हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता निमित्त कोई बलवान नहीं होता कायरो के लिए बलवान होता हैं हमेशा ध्यान रखना कि कमजोर तुम से लड़ तो सकता है लेकिन मैं इनको पीछे नहीं कर सकता उपाधान प्रधानी होते हैं वे जानते हैं कि कल मैं इसकी बराबरी कर लूँगा जब तक अपनी जाति का कोई लकड़ी को काट नहीं सकता अपने जाति का कोई भी बिगाड़ नहीं सकता घर का भेदी लंका ढाहता हैजब अपने ही अपने एक साथ हो जाए तो कुल्हाड़ी कुछ नहीं कर पाएगा
3.भगवान को कब ध्यान किया द्रव्य ज्ञान पर्याय से पर प्रत्यय हैं ज्ञान बांटते रहते हैं पर प्रत्यय है मंत्र पर स्व प्रत्यय हो जाते हैं आपके परिग्रही हो गये अकिंचन कहां आया
4.पाप ज्यादा-तुम्हें जितना समय मिला है उसमें कितना समय भगवान की भक्ति को मिलता है मन्दिर में भी हम धर्म की बाते कम करते हैं काश ऐसा हो कि मैं अधिक समय धर्म में लगाऊ अभी किचिंत भी नहीं छूटा नहीं और आकिंचन धर्म आ गया दान कभी पूरा नहीं दिया ।दिया भी नहीं जाता है लेकिन दान कब तक देना है जब तक की घास की रोटी का एक टुकड़ा भी हो
5.भोग ज्यादा दान कम-भोग का अंश ज्यादा होता हैं या दान का,दान देते समय आपको ये भाव जरूर आता है कि कोई और कार्य तो नहीं है लेकिन भोग करते समय ये भाव नहीं आता कि मुझे मन्दिर भी तो बनाना हैं कोई वात नहीं मै तुम्हारी गृहस्थी में दखल नहीं दे रहा सब होना चाहिए गाड़ी घोड़ा मकान हो समाज में जरा रूतबे से जी सकूँ इन सब के साथ बस इतना और जोड़ देना इस व्यापार से सब कुछ मिलने के साथ मैं मन्दिर भी बनाऊ मैं सौधर्म इन्द्र बन जाऊँ कल्पद्रुम महामंडल विधान करा सकूँ और इतना कर सकूँ कि कोई बीमार मेरे द्वार आ जाये तो उसका इलाज करा सकूँ।
6.त्याग के बाद दुर्गति-24 परीग्रह का त्याग करने वाला जीव अर्धपुद्गल परावर्तन तक भटक जाता है त्याग तो सबकुछ सक्लंप के साथ किया लेकिन राग बढ़ाने वाले के लिए उनको तिरोहित नहीं किया था त्याग के बाद कुछ बचता नहीं है बहुत बार हम त्यागी बन जाते हैं लेकिन कब उन्मार्ग पर चले जाते हैं पता नहीं चलता बच्चे लोग पड़ने जाते हैं कब गुटका खाना शुरू हो गया पता ही नहीं चलता बच्चे से पूछो कि तूने कोई प्लानिंग की थी वह कहता नहीं फिर भी क्यों उसके गुटखा खाना प्रारंभ हो गया पता नहीं चलता आज वस्तु का त्याग नहीं आज वस्तु के त्याग के कारण को छोड़ना है।
7.अमीर से गरीब-आश्चर्य ये नहीं कि गरीब आदमी अमीर बन गया आश्चर्य है कि अमीर आदमी गरीब बन गया,आश्चर्य ये नहीं कि अव्रती व्रती हो गया आश्चर्य ये है कि व्रती कैसे बन गया आश्चर्य अज्ञानी ज्ञानी बन गया आश्चर्य यह है कि ज्ञानी अज्ञानी बन गया आश्चर्य ये नहीं कि विकलांग पैर वाला हो गया आश्चर्य है कि पैर वाला विकलांग कैसे बन गया आश्चर्य ये नहीं कि क्रोधी में क्षमा धाराण कर ली आश्चर्य ये हैं क्षमा धारी को क्रोध किया गया आश्चर्य ये नहीं कि अपवित्र आत्मा पवित्र आत्मा बन जाये आश्चर्य यह है कि पवित्र आत्मा अवित्र आत्मा कैसे हो गई।
*प्रवचन से शिक्षा*- हमें वह छोड़ना है निमित्त हमारे सामने खड़ा नहीं हो सकता।
सकंलन ब्र महावीर
