गरीबी नहीं अपितु गरीबो को खत्म किये जा रहीं नशे की बेड़ियां
गरीबी नहीं अपितु गरीबो को खत्म किये जा रहीं नशे की बेड़ियां
आलेख-
सुरेन्द्र जैन "बाड़ी"/ धरसीवां
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जिस चार दीवारी में इंसान रहते हों उसे घर कहते हैं जहां एक से अधिक मकानों में मनुष्य रहते हों उसे मोहल्ला या गांव कहते हैं खाली जमीन को न गांव कहते हैं न मोहल्ला न राज्य न कोई देश और वहां रहने वाले मनुष्यो के आर्थिक सामाजिक धार्मिक विकास से ही वो गांव शहर राज्य या देश विकसित देश कहलाता है लेकिन जब मानव जाति के विकास में ऐंसी बेड़ियां हों जिनका चुनाव खुद मनुष्य ही किया हो तो फिर उनके आर्थिक सामाजिक चारित्रिक धार्मिक विकास की आशा करना बेमानी है यदि किसी गांव शहर प्रदेश और देश मे आबादी का दो पांच प्रतिशत लोगो का आर्थिक विकास हो जबकि शेष का नही तो चन्द लोगों के आर्थिक विकास से से वो गांव शहर या देश विकसित नहीं कहा जा सकता परिवार में यदि एक सदस्य आर्थिक रुप से संपन्न हो शेष भुखमरी की कगार पर हों तो उस परिवार को संपन्न ओर सुख समृद्धि से भरा पूरा परिवार नही माना जा सकता इसलिए किसी भी परिवार समाज गांव शहर प्रदेश और देश की उन्नति तभी संभव है जब प्रत्येक व्यक्ति आर्थिक रूप से संपन्न हो मजदूर का बेटा मजदूर न बने अपितु अपने पिता की कमाई से पढ़ लिखकर अधिकारी कर्मचारी या फिर अच्छा व्यवसायी बने तभी कोई भी देश हो वहां से गरीबी खत्म हो सकती है और वह देश विकाशशील देशों में सबसे आगे बढ़ सकता है बर्तमान में जितनी मेहनत दुनिया के अन्य देशों में वहां के रहवासी करते हैं देखा जाए तो उनसे कहीं अधिक मेहनत हमारे शेष के लोग के मजदूर वर्ग करते हैं तब भी भारत गरीबी मुक्त नहीं हो रहा यहां तक कि सरकारें भी विभिन्न योजनाएं चला रही तब भी गरीबी मुक्त न होकर धीरे धीरे गरीब मुक्त होने लगा है जिसका सबसे बड़ा कारण है नशा रूपी बेड़ियां जो अधिकांश मेहनतकश को कुछ इस तरह जकडे हैं कि उसे कभी आगे बढ़ने ही नही देती।
हाल ही में एक शराबी से अचानक हुई चर्चा का उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ जिससे सत्य स्वतः समझ आ जायेगा होटल में काम करने वाला एक 39 वर्षीय व्यक्ति चाय लेकर आया नशे में था हमसे उसने एक बात कही पत्रकार महोदय दारू भट्टी में निर्धारित रेट से दस रुपये अधिक लेते हैं उसे बन्द कराइये 110 रुपये मसाला दारू पर प्रिंट है और 120 रुपये में देते हैं हमने उससे पूंछा आप कितनी शराब रोज पीते हो उसने कहा दो बोतल रोज एक सुबह एक शाम सुनकर हम चौके इसके पास करीब ढाई सौ रुपये रोज की दारू पीने पैसे कहाँ से आते हैं हमने पूंछा कितने रुपये रोज मिलता है आपको उसने कहा चार सौ रुपये रोज मिलते हैं 250 कि दारू पीता हूँ डेढ़ सौ रूपये घर खर्च में देता हूँ हमने पूंछा कितने साल से पी रहे उसने कहा तीस साल से हमने पूछा उम्र क्या है आपकी उसने कहा 39 साल यानी वो व्यक्ति जब नाबालिग था तभी से दारू पी रहा है बर्तमान में भी गांव गांव में नाबालिग जिन्हें देश का भविष्य कहते हैं वह नशे की गिरफ्त में हैं इससे स्पष्ट है कि वह झूठ नहीं बोल रहा कि 9 साल की उम्र से ही दारू पी रहा है हमने उसे समझाया कि ढाई सौ रुपये रोज यानी साढ़े सात हजार महीने की आप दारू पी रहे सालाना लगभग 90 हजार रुपये की दारू आप पी रहे हैं 29 सालों में आप अपनी आय का दो गुना से ज्यादा की शराब पिये लगभग बीस पच्चीस लाख की इतने सालों में शराब पिये यदि यही धन आपके पास आप जोड़ते तो आपकी खुद की होटल होती बच्चे पढ़ लिखकर कहीं सरकारी नोकरी में या कहीं बिजनैसमैन होते आज आप नोकरी नही कर रहे होते बल्कि आपके यहां कोई और नोकरी कर रहे होते हमने उसे बहुत समझाने का प्रयास किया कि शराब बर्बादी की पहली सीढ़ी है इसे छोड़ दो लेकिन उसने तो एक ही बात कही की आप तो बस ओवर रेट के दस रुपये बन्द करा दो यानी अपने ओर अपने परिवार के विकास में शराब रूपी बेड़ियों का चुनाव उस व्यक्ति ने स्वयं कर लिया है यह तो एक शराबी से हुई चर्चा का वृतांत था जो हमे बर्तमान हालातो की सच्चाई से रूबरू कराता है अब हम ऐंसे हजारों लाखों मेहनतकश लोगो पर नजर डालें जो अपनी खून पसीने की कमाई का दो गुना से ज्यादा रोज शाम शराब रूपी बेड़ियों को मजबूत बनाने में खर्च करते हैं ओर कभी आगे नहीं बढ़ पाते मजदूर का बेटा मजदूर ही बना रहता है सरकारी योजनाओं से भी किसी के जीवन का उद्धार तब तक संभव नहीं जब तक अपने पैरों में बंधी शराब रूपी बेड़ियों को इंसान खुद तोड़कर न फेंके।
प्राचीन भारतीय संस्कृति सभ्यता में कहीं नशाखोरी का कोई स्थान नहीं है सभी जानते हैं कि शराब ओर चाय भारत में अंग्रेजो द्वारा शुरू की गई जबकि पहले हर भारतीय दूध पीता था सुबह जल्दी उठकर योगाभ्यास ईश्वरीय भक्ति और बाद में अपने काम पर जाता था लेकिन आंग्रेजी कुसंस्कृति के दुष्प्रभाव ने कइयों को अपनी भारतीय परंपराओं से दूर कर गलत रास्ते पर ला दिया जो कभी किसी को आगे बढ़ने नहीं देता।
विचार कीजिये यदि बर्तमान में एक बड़ी आबादी के पैरों में शराब रूपी आंग्रेजी बेड़ियां न बंधी होती तो क्या होता वह न सिर्फ आर्थिक रूप से दिनों दिन तरक्की करता बल्कि रहन सहन खान पान में भी सर्वश्रेष्ठ होता उसके बच्चे उसकी तरह मजदूर नही बनते न किशोरावस्था में नशा करते बल्कि पढ़लिखकर कहीं अच्छी नोकरी करते या बिजनेसमैन बनते उसकी सोचने समझने की शक्ति ऐंसी होती कि वह स्थानीय निकायों से लेकर लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में दारू में वोट नहीं बेचता बल्कि अच्छे उम्मीदवार का चयन करता जिससे क्षेत्र का विकास भी होता क्योकि जब इंसान संपन्न होता तो लोभ लालच में अपना इमान कभी नहीं बेचता आज जरूरत है कि नशाखोरी करने वाले स्वयं चिंतन करें कि अपने ओर अपने परिवारों के विकास में जो शराब गांजा रूपी बेड़ियां जो उन्होंने खुद बांध रखी हैं क्या वह सही हैं आज यदि कोई एक पौव्वा दारू भी रोज पीता है तो ओवर रेट में 120 की दारू बीस रुपये का चखना 140 रुपये रोज यानी 4200 रुपये महीने की खून पसीने की कमाई की वह दारू पीता है सालाना पचास हजार की दस बीस साल में वह इतने रुपयों की दारू पी लेता है कि यदि वह उस राशि को बचाकर चले तो उसका उसके परिवार का बहुत विकास हो सकता है बेंसे भी सरकारों से शराब बंदी की उम्मीद करना बेमानी है क्योकि सभी जानते है कि पानी को धीमा जहर रूपी शराब बनाकर जो लोग रोजाना हजारों करोड़ कमाते हैं उन फेक्ट्रियो के मालिक कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में राजनीतिकों के खास ही होते हैं इसलिए वह तो कभी अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारेंगे नहीं इसलिए अपने परिवार के समाज के गांव शहर देश प्रदेश के विकास में जो शराब रूपी बेड़ियों का चयन जिनने किया हैं उन्हें खुद अपनी जिव्या इंद्री को वश में कर उसे त्यागना होगा और इन बेड़ियों को तोड़कर विकास के पथ पर आगे बढ़ना होगा तभी भारत गरीबी मुक्त ओर वास्तविक रूप से विकसित देश कहलायेगा।